"बच्चे देश के भविष्य है" यह वाक्य अक्सर कहा जाता है और सभी ने सुना होगा, परन्तु क्या कभी हमने इस वाक्य पर चिंतन किया है? इस वाक्य को सुनते ही माता-पिता के दिमाग में एक चित्र उभर कर आता है कि उनके बच्चे पढ़-लिख कर बड़े होंगे, एक अच्छी नौकरी करेंगे या कुछ और बड़ा करेंगे जिससे बाकी लोग उनका सम्मान करेंगे, उनके पास बड़ा घर, गाड़ी, पैसा आदि होंगे, और उनका नाम रोशन करेंगे आदि, परंतु इस वाक्य का जो सही व गहरा अर्थ है उसको कोई समझने का प्रयास नही करता है; आईये इस वाक्य को समझने का प्रयास करते है; बच्चे देश का भविष्य है अर्थात बच्चे जैसे होंगे वैसा ही कल यानी भविष्य होगा, यह वाक्य खुद में इतना गहरा है जो न सिर्फ आने वाले पीढ़ी के बारे में इशारा करता है बल्कि उससे आगे आने वाली सभी पीढ़ियों व आज समाज में जो भी गलत हो रहा है उसके समाधान की तरफ भी इशारा करता है। अगर आज के बच्चे शिक्षित होंगे तो आने वाली पीढ़ी भी शिक्षित होगी, अगर बच्चे चरित्रवान होंगे तो आने वाली पीढ़ियां भी चरित्रवान होंगी। हर बच्चा बड़ा होगा, बड़ा होने पर उनको सामाजिक कर्तव्यों का भी पालन करना होगा, अतः जिस प्रकार का चरित्र बच्चों में है उसी प्रकार के समाज का निर्माण होगा, यह सब जानकर कर हमें बच्चों को भविष्य के लिए तैयार करना होता है बच्चे ही बड़े होकर एक बेहतर समाज का, राष्ट्र का निर्माण करेंगे इसलिए कहा जाता है बच्चे देश का भविष्य है, इस बात को हमे गंभीरता पूर्वक लेना चाहिए आज हम इस बात की ओर ध्यान नही दे रहे है इसलिए समाज व देश गलत दिशा में ज्यादा व सही दिशा में कम जा रहा है। माता पिता को यह नही सोचना चाहिए कि बच्चे बड़े होकर हमारे काम आएंगे अपितु यह सोचना चाहिए कि अगर बच्चे एक अच्छे नागरिक बनते है एक अच्छे व्यक्ति बनते है तो व्यक्तिगत, व सामाजिक, जीवन जीते हुए भी माता- पिता के प्रति ध्यान अवश्य ही होगा। जब यह कहा जाता है कि बड़ा सोचो इसका मतलब खूब धन कमाने से नही होता बल्कि कुछ ऐसा करने से होता है जिसमें ज्यादा से ज्यादा लोगों का कल्याण हो सके, फिर धन, और सम्मान तो आ ही जाता है। ज्यादातर लोग सोच रहे होंगे कि बेहतर समाज के निर्माण के लिए तो कुछ अतिरिक्त योगदान देना पड़ता है, घर से बाहर जाकर अतिरिक्त समय देना पड़ता है वास्तव में हमारा जैसा चरित्र, शिक्षा, व दूसरों के प्रति व्यवहार होता है उसी से हमारे घर, समाज व देश का निर्माण होता है जिस प्रकार एक कक्षा में आदर्श छात्र ज्यादा होने से गिने चुने नालायक छात्र भी आदर्श बनने लगते है और उस कक्षा की हर जगह प्रशंसा होती है उसी प्रकार आदर्श व्यक्ति होने से अन्य भी वैसे हो जाते है और एक अच्छे समाज का निर्माण होता है फिर वे अपने बच्चों को भी आदर्शवादी बनाते है इससे अच्छे भविष्य का निर्माण होता है, वहीं यदि बच्चों को सही शिक्षा, व अच्छे चरित्र का निर्माण न किया जाए तो कुछ गलत लोगों से प्रेरणा ले कर वे बच्चे गलत दिशा में भी जा सकते है और गलत समाज का निर्माण कर सकते है।
आधुनिक समय में माता पिता का बच्चों की शिक्षा में योगदान
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प्राचीन समय में सभी को विवाह से पूर्व तक सम्पूर्ण जीवन शिक्षा दे दी जाती थी जो भी उनके जीवन के लिए उपयोगी होती थी और उनके विवाह के पश्चात वे अपने बच्चों को भी श्रेष्ठ शिक्षा स्वयं भी देते थे और थोड़ा बड़े होने पर उनका गुरुकुलों में प्रवेश करवाते थे वहां वे 25 वर्ष की आयु तक पढ़ते थे जहां शिक्षा देने वाले पूर्ण विद्वान, प्रज्ञावान हुआ करते थे तब तक हमारे भारत में श्रेष्ठ, दिव्य, वज्र की भांति, ओजस्वी, तेजस्वी बच्चे हुआ करते थे वे जब बड़े होकर अपनी अपनी जिम्मेदारियां निभाते थे तब उनके सानिध्य में इस देश में कभी कुछ गलत नही होता था। आज शिक्षा का स्तर इसलिए गिरता जा रहा है क्योंकि शिक्षा की डोर भ्रष्ट व आविद्वानियों व आधे-अधूरे ज्ञान वालों के हाथ में है जो शिक्षक विद्यालय में शिक्षा देते है वे खुद गलत आदतों के शिकार है यदि हमें पता चले तो क्या हम अपने बच्चों को ऐसे शिक्षकों से पढ़ाएंगे? एक अच्छे शिक्षक की पहचान उसके साधारण कपड़े, लोभ, क्रोध, मोह से दूर, उसके शुद्ध, विनम्र, आचरण, ज्ञान, पुरुषार्थ, हमेशा जानने की इच्छा रखने वाला, सदसंगत से होती है परंतु क्या हमें ऐसे शिक्षक आज मिलते है अधिकांश तो नही मिलते तब ऐसे में माता पिता की जिम्मेदारी और भी अधिक बढ़ जाती है कि वे अपने बच्चों के शिक्षा व शिक्षक का चयन सोच समझ कर करें वे क्या पढ़ रहे है उसका क्या परिणाम होगा, बच्चों में किस तरह के विचार जन्म ले रहे है व बच्चे किन बातों पर अच्छी व गलत प्रतिक्रिया देते है और जिन बातों पर वे प्रतिक्रिया देते है क्या वह बात वाकई में गलत है या सही या बच्चों को गलत अर्थ मालूम पड़ रहा है इसकी जांच कर उनके अंदर से सभी विचारों को व प्रश्नों को निकाल कर उत्तर देना सभी भ्रमित व अशुभ बातों को व उनके विचारों को स्पष्टता प्रदान कर शुभ की तरफ मोड़ के हम बच्चों में एक अच्छे, व शिक्षित व्यक्तित्व का निर्माण कर सकते है, बच्चों के मानसिक व व्यक्तित्व विकास के लिए उनकी मानसिक गतिविधियों पर पल-पल नज़र रख कर ही उनको जड़ से अनुशासित, शिक्षित, चरित्रवान और जैसा फिर हम शिक्षा देंगे वह बच्चा वैसा ही बनेगा। अब माता पिता का प्रश्न होगा कि बच्चे तो बचकाने प्रश्न पूछते है हम उनके प्रश्न देते-देते थक जाएंगे और माता पिता को भी उत्तर नही आते होंगे, इसका उत्तर यह होगा कि साक्षरता व विषय संबंधित जिज्ञासाओं के लिए माता पिता को भी खुद सीखने की, जानने की जिज्ञासा होनी चाहिए और मानसिक व व्यक्तित्व निर्माण के लिए माता पिता का खुद का चरित्र भी महत्वपूर्ण होता है क्योंकि वे बच्चों को वैसी ही शिक्षा देते है व माता पिता आदर्श व्यक्तियों की बातें बताकर, हमारे भारत के इतिहास के बारे में बात कर, अच्छी प्रेरणा देकर भी बच्चों के मन में अच्छे विचारों का निर्माण कर सकते है ऐसा होने पर वे स्वयं ज्यादातर जो भी प्रश्न पूछेंगे वे ऐसे ही होंगे जिनके उत्तर मिलने पर वे कभी न भटक सकते है न गलत मार्ग पर जा सकते है, जब कोई घर में व आस-पास घटना हो तब उचित समय देखकर बच्चों के विचारों को भांपने की कोशिश करे कि इस घटना से उनके मन पर क्या प्रभाव पड़ा गलत या सही उसी अनुसार उनको उचित मार्गदर्शन दें आजकल ऐसी भी स्थिति हो गयी है कि कुछ भी होता रहता है कैसी भी घटना हो किसी पर कोई असर नही होता यह भी गलत है अगर किसी घटना पर बच्चे चिंतन नही करेंगे तो वे कैसे जानेंगे क्या सही है क्या गलत और क्या होना चाहिए यहीं से उनके अंदर सही गलत के प्रति गंभीरता, दृढ़ता पैदा होती है इसीलिए गंभीरता को मानसिक रोग न समझे परंतु गंभीरता और दृढ़ता किस विचार को जन्म दे रही है यह स्पष्ट करना चाहिए उदाहरण से समझते है मान लीजिए किसी बच्चे ने यह देखा की एक भाई और बहन में लड़ाई हो रही है और भाई अशब्द कह रहा है व बहन को मार रहा है अब बच्चे के पहले के विचारों व संस्कारों पर निर्भर करता है कि वह किस तरह से प्रेरणा ले वह यह सोच सकता है की "मैं भी अपनी बहन के साथ ऐसे ही करूँगा" और उसमें दया आ रही होगी तो वह ऐसे भी सोच सकता है कि "मैं तो ऐसे कभी नही करूँगा" अब बड़ो को पता है कि इन दोनों ही विचारों में शुभ क्या है बच्चों में चाहे जो विचार आया हो पर बड़ो की कोशिश होनी चाहिए कि वे बच्चों के विचारों को खंगाल कर उन्हें शुभ दिशा दें, और बचपन में ही उनके मन में सत्य, अच्छाई, एकता, देश, समाज, चरित्र, ऊर्जा, आदि गुणों के बीज बो दे। अब कुछ माता पिता के मन में एक और प्रश्न आ रहा होगा कि आज का माहौल ही इतना खराब है कि हम उन्हें सत्य के मार्ग पर ले जाएं, विनम्र बनाएं तो और लोग उन्हें खा जाएं, वे कैसे खुल कर जिएं, सब उनका फायदा उठा लें; उत्तर यह है कि वे अपने बच्चों का शुरुआती जीवन में पूर्ण सत्यता, पूर्ण संस्कार, पूर्ण समर्पण, दुसरो की मदद आदि आदि अच्छा आचरण दे उसके बाद जब बच्चे थोड़े-थोड़े बड़े होने लगें तो वास्तविक माहौल से भी परिचय करवाएं उसके बाद उन्हें ऐसी सूझ-बूझ सिखाएं की उनके अंदर दूसरों के प्रति प्रेम, एकता भी रहे और समय आने पर अपना बचाव भी कर सके परंतु यह नही होना चाहिए उदाहरण स्वरूप बच्चों से माँ कहती है "अपनी पेंसिल किसी को न देना" यदि छोटे बच्चे में किसी को न देने वाली आदत आ गयी तो वो बड़े होकर अपने घरों में ही मदद नही देगा और दूसरों की मदद भी नही करना सीखेगा, साथ ही उसमें स्वार्थ जन्म लेगा और दूसरों के प्रति अपनापन नही होगा, जब बच्चा छोटा हो तो उसे यही सिखाना चाहिए कि दूसरों की मदद करे क्योंकि मदद करना उसने बचपन से सीख लिया तो आगे भी करेगा , जब बच्चे बड़े होने लगे तब उन्हें छोटे-छोटे उन ही के जीवन से ही उदाहरण लेकर समझाएं की किस परिस्थिति में मदद करनी है कब नही करनी है व अगर नही करनी है तो क्यों नही करनी है क्या वाकई सामने वाले कि जरूरत है या नही ये सब सूझ बूझ उन्हें सिखाएं ताकि बच्चे स्वयं सही गलत ढूढं सकें।
नीचे कुछ सुझाव है जिनको अपनाकर हम बच्चों का अच्छा निर्माण कर सकते है।
- सर्वप्रथम तो माता पिता को यह ही समझना चाहिए जिस बात को मैं बार-बार दोहरा देना चाहती हूँ कि बच्चों को बच्चा समझ कर ही न बड़ा करे, बच्चों का विकास करना एक बहुत जिम्मेदारी व गंभीर कार्य है इसे हल्के में न ले और बच्चों को बड़ा करना यानी सिर्फ उनके खाने, पीने, पहनने, विद्यालय का खर्चा पूरा करना, उन्हें लाड़ करना ही माता पिता की जिम्मेदारी नही होती बल्कि, मनोवैज्ञानिक रूप से कैसे हमे सही शिक्षा देना है एक अच्छे युवक / युवतियों का, अच्छे व्यक्तियों के निर्माण करना है उन्हें उनके पूर्ण जीवन की शिक्षा देंने जितनी जिम्मेदारी होती है और इसके लिए माता पिता को खुद को सजक होने की आवश्यकता होती है और जिम्मेदार होने की आवश्यकता होती है।
- बच्चों को सिर्फ और सिर्फ वही चीज़ की प्रेरणा दे जो साधन उनके अच्छे निर्माण में सहायक हो।
- बच्चों के सामने गलत शव्द, फालतू बातें, दूसरों की बुराई आदि बातें बच्चों के सामने न करे।
- माता पिता प्रायः कुछ नया सीखते व सिखाते रहे।
- बच्चों के सामने साधारण कपड़ो में रहे, व साज-सज्जा की तरफ उनका ध्यान न जाये ऐसे घर का वातावरण रखें, घर को जितना हो प्राकृतिक रखें या प्राकृतिक वस्तुओं द्वारा प्रेरणा देने का प्रयास रखें, हमे सभ्यता का ध्यान रखना है, साफ-सफाई का ध्यान रखना है पर किसी चीज़ की तरफ हम आकर्षित हो ऐसी वस्तुओ से बच्चों को बचाना है।
- वैदिक संस्कृति को घर पर अपनाएं व बच्चों को भी फॉलो करने को कहें।
- बच्चों के सामने मोबाइल या घंटों तक फ़ोन पर बात करने से बचे, उन्हें यह दिखाएं की फ़ोन तो सिर्फ काम के वक़्त इस्तेमाल किया जाता है न कि मज़े करने के लिए।
- भारतीय इतिहास आदि की कहानियां, प्रसंग आदि को बच्चों को बताते रहे।
- भारत दर्शन के लिए उन्हें समय समय पर ले जाते रहे और ऐसी कोशिश होनी चाहिए कि बच्चे यहां से कुछ अच्छी प्रेरणा लेकर जाए।
- उनके विचारों, प्रतिक्रियाओं पर नज़र रख विवेक से उनके विचारों को स्पष्ट कर उन्हें शुभ की तरफ मार्गदर्शित करे।
- खाने के प्रति, कपड़ों के प्रति वस्तुओं के प्रति उनमें ज्यादा लोभ व प्रीति न आने पाए इसके लिए उन्हें पहले से ही ऐसी प्रेरणा दे कि बच्चे महत्वता जानकर किसी वस्तु को पाने की इच्छा रखे न कि किसी की तरफ आकर्षित होकर ऐसा तब हो सकता है जब हम उन्हें शुभ-अशुभ, आवश्यक-अनावश्यक, सदुपयोग-उपयोग, उपयोग-दुरुपयोग, आदि बातों में अंतर बताएं और सत्य सही की तरफ उन्हें ले कर जाएं।
- माता-पिता चाहे तो हर क्षण, व्यस्त समय में ,काम करते करते भी बच्चों को कुछ नई सीख दे सकते है।
- घर में सिर्फ बच्चों की विद्यालय के विषयों की किताबें नही बल्कि नैतिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, प्रेरणादायक किताबें भी लाकर रखें।
माता पिता की अक्सर गलतियां
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देखा जाए तो माता पिता की भी कोई गलती नही है क्योंकि जैसी शिक्षा, प्रेरणा, विचार, माहौल मिला उसका ही परिणाम आज उनका वर्तमान है, यह गलत माहौल बहुत समय से चला आ रहा है कि माता पिता खुद अज्ञानी होते है उन्हें यह नही पता होता बच्चों का निर्माण कैसा होना चाहिए, जब यही नही पता तो यह पता होना की माता पिता ऐसा क्या करे जिससे उनके बच्चे ज्ञानी, विद्वान, और आचरणवान बने दूर की बात है,
सर्वप्रथम यह बात पहले ही स्पष्ट है कि बच्चों को हमे ऐसे बनाना है जो न सिर्फ अपने घर के होकर रहे बल्कि अपने समाज, देश, प्रकृति, आदि की तरफ भी जिम्मेदार बने, उनमें पूर्ण आचरण हो, शुभ अशुभ का ज्ञान हो, एक तरह से हर लड़के को श्री राम, और हर लड़की को सीता जी जैसे गुणवान बनाना है जिनमें ज्ञान, विद्या, बल, शास्त्र, शस्त्र, आधुनिक विज्ञान, कला आदि में कुशल हो, क्या यह मुश्किल है नही परंतु यह हमें बचपन से तैयार करना होगा। आईये जानते है कैसे:
आज भागदौड़ भरे जीवन में यह थोड़ा मुश्किल होता है कि माता पिता विवेक और शांति से अपने बच्चे की शिक्षा में ध्यान दे बहुत से माता पिता थक जाते है और अगर वे बच्चे को पढ़ाते भी है तो जल्दी जल्दी, चिढ़ते, खिसियाते हुए, उसके ऊपर से बच्चे ने कुछ फालतू सवाल कर दिया तो और गुस्सा आ जाता है याद रखना है फालतू सवाल हमारे लिए है उसके लिए जानना जरूरी है, ऐसी स्थिति में माता पिता कुछ और बातों पर ध्यान देना भूल जाते है जिसका बच्चों के बड़े होकर उन्हें पछतावा होता है, सबसे बड़ी गलती होती है शुभ और अशुभ में स्पष्टता का न होना जैसे; शिक्षा और साक्षरता को एक समझ लेना, शिक्षा का सही अर्थ न पता होना, शव्दों का सही ज्ञान न होना, civilized बनना है पर सभ्य नही उन्हें नही पता कि दोनों का अर्थ एक ही है, स्वाभिमान व अभिमान में अंतर नही समझ पाना, बहादुरी व हिंसा में अंतर नही समझना आदि अगर इन गुणों व शव्दों की समझ माता पिता में नही होगी तो वे अपने बच्चों को मनोवैज्ञानिक रूप से उनके आचरण में अंतर नही कर पाएंगे कि उनके बच्चे में सही गुण आ रहे है या नही, या उन्हें तब पता चलता है जब बच्चे का आचरण माता पिता पर भारी पड़ता है ऐसा हो उससे पहले ही हमे समझ लेना चाहिए, उदाहरण स्वरूप;
बहादुरी और हिंसा में अंतर न समझना: मैंने अपने अनुभव में ऐसे बहुत से माता पिता देखें है जो अपने हिंसात्मक बच्चे के व्यवहार को उनका बहादुर, ताकतवर होना समझते है आईये जानते है क्या होना चाहिए क्या नही;
हिंसा क्या है? एक तरह से देखा जाए तो हिंसा ताकत का असभ्य रूप है एक असभ्य व्यक्ति जब ताकत का अनुचित जगह उपयोग करता है या जब छोटी-छोटी बात पर मार पीट, तेज आवाज, अभद्र शव्दों का उपयोग व चीखना-चिल्लाना, अपने स्वार्थ के लिए सर्वहित न देखना और अपनी इच्छा की पूर्ति न होने पर दूसरों पर अत्याचार करना, क्रोध करना हिंसा है इसके विपरीत जरूरत की जगह ताकत दिखाना ही बहादुरी है, एक सहनशील व विनम्र व्यक्ति भी बहादुर होता है अगर वह किसी ऐसे कार्य के लिए आवाज़ उठा रहा है जिसमें सर्व जन कल्याण है तो वह बहादुरी है, शिष्टता के साथ सत्य कहने वाला भी बहादुर है, धीरे बोलने वाला व्यक्ति यदि सत्य कहने से नही डरता तो वह बहादुर है , किसी के जीवन को वह अपने जीवन की बलिदानी देकर बचाता है तो वह बहादुर है और ऐसे ही बहुत से उदाहरण है जिनसे हम पहचान कर सकते है कि बच्चों में सही गुण है या नही,
जब बच्चे कहते है कि सामने वाले ने ऐसा किया हम भी ऐसा करेगे, हम क्यों न करे यह बात बच्चों के मुँह से सुनकर माँ अपने बच्चों को बहुत ताकतवर समझती है पर वह भूलजाती है कि हम सामाजिक प्राणी है हम में सहनशीलता भी होनी चाहिए।
इन सब बातों का उचित अनुचित देख कर गंभीरतापूर्वक ध्यान में रखकर हमे बच्चों का विकास करना चाहिए।
बहुत सुंदर
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